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प्रकृति गोद में

                
                                                         
                            आओ
                                                                 
                            
चलें दूर कहीं
छूती जहां
गगन चोटियां
चीरती
हृदय नदियां
मन
जो रम जाए
कदम
जहां थम जाए
आत्मा
तृप्त हो
तृष्णा
शांत हो
पीड़ा
जीवन की
काया
से मुक्त हो
लताएं
हरी भरी
धारा
बह रही
पीपल
डाल पर
कोयल
बोल रही
लौट कर
आऊं नहीं
छोड़कर
जाऊं नहीं
धरा
जो भा जाए
थकान
जो मिट जाए
सुकून
थोड़ा ही सही
जैसे
दूध और दही
वृक्ष
जो खाते नहीं
नदी
जो पीती नहीं
सागर
जो बोलते नहीं
दरिया
जो रुकते नहीं
दृश्य
मनोरम
आंखें
हुई नम
प्रकृति गोद में
बैठे अकेले
लताओं के जैसे
लगते मेले
आशा
जीवन की
लालसा
जीने की
भय
मृत्यु का
दुःख
शरीर का
अंत
कहानी का
आग
हवा पानी का
सत्य
एक ही नाम
चलें
परम धाम
बोलो
जय श्री राम
बोलो
जय श्री राम
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2 महीने पहले

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