वृद्धाश्रम
यादों में खोये,
सोचा न था,
जीवन के अंतिम पडाव में
मिलेगा नया आशियाने।
उम्मीद बहुत था,
अपने खून पसीने से
सीचा था उसे
बदलने का पता नहीं था।
बहुत खुश था,
जब वह शहर गया था,
पत्र पाते ही उछल पड़ा था,
इस दिन का एहसास नहीं था।
हर पल उसकी छाया बनकर
दुःख सहकर
तानों का घूँट पीकर
आज निकल रहे आँसू बनकर।
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