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विचित्र है आदमी

                
                                                         
                            विचित्र है आदमी
                                                                 
                            
अपने कद से बड़ा दिखना चाहता है आदमी
कालचक्र के चक्र को रोकना चाहता है आदमी
कभी मृदुल बयार को झंझावात समझ लेता है आदमी
कहीं उठते-गिरते लहरों को तूफान समझ लेता है आदमी
अपने अंदर के हलचल को कभी-कभी भूचाल समझ लेता है आदमी।

तोला से माशा और माशा से तोला
कभी-कभी डगमगाता और सॅंभलता चलता है आदमी
हैरानी और अचम्भा, कैसा विवरण !
कठिनाई के क्षणों में एकनिष्ठ आदमी
संघर्ष के पलों में गजब की आत्म-स्फूर्ति दिखलाता है आदमी।

विचित्र और बड़ा विचित्र है आदमी
-नाग मणि
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2 महीने पहले

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