पलकों से विनती
पलकों से विनती है
धीमे से झुकना
नाज़ुक छवि नयनों में बसी है
कुम्हला न जाये झटके से कहीं।
जब भी हो उठना
सॅंभल कर ही उठना
छवि है वो छुई-मुई
चमक की तपिश में मुरझा न जाये।
संवारा है यत्नों से
बिठाया है यत्नों से
विश्वास की देन है
दिखते नहीं, मन में ही बसते हो
मन में ही बसते हो।
-नाग मणि
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