आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

चमक की तपिश में मुरझा न जाये।

                
                                                         
                            पलकों से विनती
                                                                 
                            

पलकों से विनती है
धीमे से झुकना
नाज़ुक छवि नयनों में बसी है
कुम्हला न जाये झटके से कहीं।

जब भी हो उठना
सॅंभल कर ही उठना
छवि है वो छुई-मुई
चमक की तपिश में मुरझा न जाये।

संवारा है यत्नों से
बिठाया है यत्नों से
विश्वास की देन है
दिखते नहीं, मन में ही बसते हो
मन में ही बसते हो।
-नाग मणि
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर