आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

वो दोस्त है मेरा नादान है...

                
                                                         
                            वो दोस्त है मेरा नादान है.....
                                                                 
                            
हा है समझदार भी दुनिया के लिए !
वो चाहते हैं मैं बनूँ उसका जिगर का टुकड़ा ....
उस नादान को कैसे समझाऊ है लाखों....
हो तुम बेहतर के काबिल ...!
तुम्हारी मुस्कान है अनुपम मोल नहीं कर सकती अनमोल हो तुम ....!
तुम्हारे साथ खुद का चेहरा देखती हूँ .....
हारी हूँ कहीं दोस्ती मैं मुस्किल है उस भूत से निकलने में...
डर है कहीं छोड़ ,....कहीं तुम आगे निकल न जाओ
कहीं आदत न बन जाओ !
तुम्हारी समझदारी मुझे समझाती है कोई चार लोग नहीं होते
जीना है तो अपनी लाइफ जियो ...!
कुछ तो बातों का असर हुआ है न्यूटन का नियम न सही सखा के नियम जरूर असर हुआ है...!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर