वो दोस्त है मेरा नादान है.....
हा है समझदार भी दुनिया के लिए !
वो चाहते हैं मैं बनूँ उसका जिगर का टुकड़ा ....
उस नादान को कैसे समझाऊ है लाखों....
हो तुम बेहतर के काबिल ...!
तुम्हारी मुस्कान है अनुपम मोल नहीं कर सकती अनमोल हो तुम ....!
तुम्हारे साथ खुद का चेहरा देखती हूँ .....
हारी हूँ कहीं दोस्ती मैं मुस्किल है उस भूत से निकलने में...
डर है कहीं छोड़ ,....कहीं तुम आगे निकल न जाओ
कहीं आदत न बन जाओ !
तुम्हारी समझदारी मुझे समझाती है कोई चार लोग नहीं होते
जीना है तो अपनी लाइफ जियो ...!
कुछ तो बातों का असर हुआ है न्यूटन का नियम न सही सखा के नियम जरूर असर हुआ है...!
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