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मैं जुगनू-सी

                
                                                         
                            कभी-कभी यूँ खो जाती हूँ,
                                                                 
                            
फिर से अपनी हो जाती हूँ।
दूर तलक अंधेरे में भी,
मैं जुगनू-सी हो जाती हूँ॥

चलते-चलते मिलते अक्सर,
राहें, बाहें और निगाहें।
कुछ पल का ही साथ निभाकर,
ओझल हो जाती हैं राहें।
उनको अपना करते-करते,
मैं भी उनकी हो जाती हूँ…

चलती, गिरती- पड़ती, उठती,
फिर से आगे बढ़ती रहती।
जब थक जाती राहों में तो,
गिरते-गिरते सो जाती हूँ…
कभी-कभी यूँ खो जाती हूँ,
फिर से अपनी हो जाती हूँ॥

फिर बढ़ती हूँ नई दिशा में,
नया शोर और नई कहानी।
कई आवाज़ें, कई चेहरे,
बन जाते हैं याद पुरानी।
कुछ-कुछ यादें अक्सर आकर,
मुझमें ही बस खो जाती हैं…
कभी-कभी यूँ खो जाती हूँ,
फिर से अपनी हो जाती हूँ॥

कभी-कभी यूँ खो जाती हूँ,
फिर से अपनी हो जाती हूँ।
दूर तलक अंधेरे में भी,
मैं जुगनू-सी हो जाती हूँ।।
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एक दिन पहले

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