पक्की दीवारें, ऊँचा मकान,
कहाँ ये सब सच्चा लगता है,
मुझे तो अपना वो मिट्टी का मकान ही अच्छा लगता है।
बचपन की यादें हैं उस घर से जुड़ी हुई,
जब खेल-कूद के घर को आती थी,
वो दालान में ही चौकी पर रखे चूल्हे पर,
अम्मी खाना बनाती थी।
जब सर्दी में सुबह-सुबह,
हम बोरी बिछाकर बैठ जाते थे,
सर्दी के वो मज़े,
कहीं और कहाँ आते थे।
अतीत के पन्नों का वो ही दौर सच्चा लगता है,
मुझे तो अपना वो मिट्टी का मकान ही अच्छा लगता है,
मुझे तो अपना वो मिट्टी का मकान ही अच्छा लगता है।
सच कहूँ तो ज़िंदगी भागती जा रही है,
वो बचपन की आदत छूटती जा रही है,
पर दिल के किसी कोने में वो याद अब भी ज़िंदा है,
कल से मोहब्बत बहुत थी मुझे,
पर ना आज से निंदा है।
सड़कें अब पक्की हैं,
पर मन वो रास्ता कच्चा लगता है,
मुझे तो अपना वो मिट्टी का मकान ही अच्छा लगता है।
बरसों बीत गए उस बात को,
पर सपने उसी के आते हैं,
हम बड़े ज़रूर हो गए,
पर वापस उसी घर जाते हैं।
जो अब ज़िंदगी में आए हैं,
वो भी उसी घर में दिखते हैं,
सपनों के जहाँ में तो,
बस वो ही दिन टिकते हैं।
है वो सपना,
पर हक़ीक़त से ज़्यादा सच्चा लगता है,
मुझे तो अपना वो मिट्टी का मकान ही अच्छा लगता है।
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