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नदी की धारा

                
                                                         
                            ऐ नदी की धारा, ज़रा धीरे चल
                                                                 
                            
देख पीछे कितना कुछ छूट रहा है।

तू तो अपनी बहाव में बहती चली जाएगी,
कहाँ ये खूबसूरती कहीं और मिल पाएगी।
वो वादियाँ जो तू धारा के चलते छोड़ आई,
वो कुदरत के ऊँचे-ऊँचे पहाड़,
वो ग्लेशियर के हसीन नज़ारे।
पिघलती हुई बर्फ जब
तेरे बदन को छूती है,
जाने क्यों छिड़कर तू ,
उससे और दूर होती है।
अपना प्यार भेजकर जब
बाहें फैलाकर वो पास बुलाती है,
नाराज़ होकर तू दूर भाग जाती है।

ऐ नदी की धारा, ज़रा धीरे चल,
देख पीछे कितना कुछ छूट रहा है।

याद है हम जब पहाड़ से होकर आए थे,
कितने सारे अनमोल रत्न अपने साथ लाए थे।
क्या पता किस बात पर तू यूँ ही रूठ जाती थी,
बो सारी धरोहर तू वहीं छोड़ आती थी।
तू क्या जाने उन्होंने तुझे कितना निहारा था,
उन रत्नों के डेल्टा ने तुझे कितना पुकारा था।

ऐ नदी की धारा, ज़रा धीरे चल,
देख पीछे कितना कुछ छूट रहा है।

देख, इस प्रभाव में तेरा सब जा रहा है,
कहाँ कोई तेरा अपना तेरे साथ आ रहा है।
जाने कितने ही साथी तूने बनाकर छोड़ दिए,
हर कोई धारा के प्रभाव से छूटता जा रहा है।
ठहर तू, अगर तेरी गति यूँ ही बढ़ती जाएगी,
खो देगी अस्तित्व, समुंदर में मिल जाएगी।

ऐ नदी की धारा, ज़रा धीरे चल,
देख पीछे कितना कुछ छूट रहा है।
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2 महीने पहले

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