जब लिखना चाहा सच, तो क़लम टूट गई।
जब पाना चाहा ख़ुद को, तो क़लम टूट गई।
तेरी याद में तो हमने काफ़ी लिखे नज़्म,
जब लिखना चाहा ख़ुद को तेरे साथ, तो क़लम टूट गई।
आँखों में अश्क़ है क्योंकि क़लम टूट गई,
हम भी अब थोड़े व्यस्त हैं क्योंकि क़लम टूट गई।
आज सब हैं यहाँ, आप हैं, आप हैं और आप भी,
पर अब क्या करें इस भीड़ का जब क़लम टूट गई।
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