राज्य हित अब गौण हुये।
चरणवंदन को आतुर हो।।
मुखराविंद सब मौन हुये।
स्वार्थ सिद्धि के खातिर।।
बागी सूरमा रणछोड़ हुये।
हिमपुत्रों की अनदेखी है।।
प्रवासी अब सिरमौर हुये।
-मुकेश डबराल "निडर
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