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नज़र में जो हसीं मंज़र खड़े हैं

                
                                                         
                            नज़र में जो हसीं मंज़र खड़े हैं
                                                                 
                            
ये बनकर फूल या पत्थर खड़े हैं

जो बाहर इस क़दर ख़ामोशियाँ हो
कि अंदर शोर के लश्कर खड़े हैं

अना कब तक भला साथ अपना देगी
मेरे दुश्मन तो सब बाहर खड़े हैं

तलाश-ए-ज़िंदगी में जाने वाले
सर-ए-राह आज भी बेघर खड़े हैं

उठा तू बोझ अपना ख़ुद ही ऐ दिल
कहाँ बस्ती में अब रहबर खड़े हैं
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4 घंटे पहले

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