तुम्हारी आरज़ू में इस क़दर मसरूफ़ रहते हैं,
कि ज़माने की हमें कोई ख़बर तक नहीं होती।
मंज़िल की तमन्ना किसे है इस जहाँ में अब,
तुम्हारी राह से गुज़रे बिना तो अपनी सहर नहीं होती।
बड़ी पाकीज़ा है ये उल्फ़त मेरी तुम्हारे लिए,
जैसे रूह का रूह से कोई कदीमी राब्ता हो।
दुआ में हाथ उठें तो बस यही ख़याल आता है,
ख़ुदा करे कि ज़िन्दगी का हर रास्ता तुमसे वाबस्ता हो।
तुम्हारी आँखों के साए में सुकूँ मिलता है इस दिल को,
जैसे सदियों की प्यास को कोई चश्मा मिल गया।
नज़रें चुराकर जो तुम मुस्कुरा देते हो हौले से,
लगता है कायनात का सबसे हसीं तोहफ़ा मिल गया।
इबादत सी है ये मोहब्बत,
कोई दस्तूर नहीं,
तुमसे दूर रहकर भी तुम दिल से दूर नहीं।
ये कैसा जादू है तुम्हारी सादगी का ऐ हमदम,
कि अब तुम्हारे सिवा कोई और मंज़ूर नहीं।
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