रूह का बुलावा
वो इश्क़ ही क्या जिसमें फना होने का डर हो,
मोहब्बत वही जो मौत से भी बेअसर हो।
पकड़ कर हाथ तेरा,
हमने हर मुश्किल को हंस के बिताया है...
सच ही तो है...
जिसने मोहब्बत को गले लगाया है, उसने मौत को भी गले लगाया है।
ये जिस्म तो मिट्टी है,
एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा...
पर यादों का कारवां यादों में ही खिल जाएगा।
तू चला गया मंज़िल की ओर...
छोड़ कर ये वीरान गली...
मगर तेरी खुशबू आज भी मेरे पास है चली।
वो जो एहसास था तेरी मौजूदगी का...
वो रूह में समाया है..
चला गया वो दूर,
आख़िर में उसकी रूह ने भी हमें गले लगाया है।
नसीब में नहीं थी इस ज़मीन की मुलाकातें,
अधूरी रह गईं वो लम्बी, हसीन रातें..
मगर उस पार एक जहाँ है....
जहाँ सिर्फ नूर रहता है...
जहाँ आशिक़ों का खुदा, बंदों के ही हुज़ूर रहता है।
अब आंसूओं को पोंछ ले..
क्योंकि वक्त-ए-मिलन आया है...
ना मिल सके हम यहाँ...
चल तुझे और मुझे ईश्वर ने बुलाया है....!
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