जब-जब जड़ता ने मन पर अपने ताले जड़ डाले
तब-तब तेरी विपंची ने मौन हृदय में स्वर ढाले
विपंची का एक-एक स्वर वेदों का उद्घोष बने
मूक अधरों की मौन व्यथा भी मधुर प्रार्थना-कोष बने
तेरी विपंची की झंकारों से ऋचाओं का विस्तार हुआ
अक्षर-अक्षर सत्य लिखा मानव का नव श्रृंगार हुआ
हे शारदे! ऐसा वर देना मन निर्मल निश्छल प्रीति बने
मेरी लेखनी की हर धड़कन ...तेरा ही संगीत बने
-मीना गोपाल त्रिपाठी
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