हौसलों का टूटना कोई बड़ी बात नहीं..
अब टूटकर भी खड़े होने की ज़िद है!
ग़ैरों से न कोई शिकवा न शिकायत रही..
अब तो बस ख़ुद से ही जंग की ज़िद है!
हौसलों को भी ख़बर नहीं हद कहाँ है मेरी..
आँधियों में भी चराग़ जलाने की ज़िद है!
मेरी राह में अड़चनें बिछाते रहे लोग..
हर अड़चन को सीढ़ी बनाने की ज़िद है!
ठोकरें मिलीं तो सफ़र ने तराशा मुझको..
हर ठोकर से खुद को और बेहतर बनाने की ज़िद है!
सफ़र की शिकस्तों का ज़िक्र क्या करना...
उम्मीदों की लौ हर हाल में जलाए रखने की ज़िद है!
- मीना गोपाल त्रिपाठी
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