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शहीदान वतन

                
                                                         
                            ------------- शहीदान वतन --------------
                                                                 
                            

चलते रहे, बढ़ते रहे, पीछे ना हटाए कदम
हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई मिलकर बढ़ाए कदम

वतन से थी मोहब्बत तो दे दिए जान भी
हंसते-हंसते वतन पे हो गए कुर्बान भी

ज़ालिम हुकूमत के सामने झुके नही कभी
सच्चे देशभक्त थे इसलिए बिके नही कभी

हकीकत में वतनपरस्ती का जज्बा था
अंग्रेजों से ना डर कोई ना खदशा था

लुटेरा भी था और हुकूमत थी ज़ालिम की
पेड़ों पर लटकी लाशें मिली थी आलिम की

जुल्म की इंतहाओं का सिलसिला रुका नहीं
काला पानी की सजा से हिंदुस्तानी ऊबा नहीं

इंकलाब जिंदाबाद, का नारा बुलंद करता रहा
चूम लिया फांसी का फंदा तख्त पर लटका रहा

भूल जाओ नफरत को शहिदान वतन के नाम पर
हो जाए मोहब्बत का असर अपने मुल्क के आवाम पर

कैसे बताऊं हिंद से कितना मुझे है प्यार
लफ्जों में उसे बता नहीं सकता है इफ्तेखार

 
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2 महीने पहले

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