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बदल जाएगी ये दुनिया भी तुम्हें एक दिन देखने के बाद

                
                                                         
                            फ़रिश्ते हो नहीं तुम ख़ुदा की फुर्सत का कोई हसीन पैगाम लगते हो
                                                                 
                            
तुम वफ़ा की राह पर चलता कोई इंसान लगते हो।

जहाँ में हर तरफ फैली है जो नफ़रत की तल्ख़ी,
उसे पल में मिटा देने वाली मुस्कान लगते हो।

देखा जो चेहरा तुम्हारा यूँ बे-पर्दा
दिल भी साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ रखते हो
तुम इस मुनाफ़िक़ शहर में सच की पहचान लगते हो।

सुबह की शान लगते हो बहुत नादान लगते हो
मिसाल-ए-ज़िंदगी हो तुम नेक इंसान लगते हो।

महकती शबनम की बूंदें हों जैसे सब्ज़ पत्तों पर
खुशी के गीत के तुम बुलंद तान लगते हो।

जो छू ले हवा तुम को तो ख़ुशबू और बढ़ती है
चमन की शाख़ पर खिलते हुए मुस्कान लगते हो।

ज़रा बचना तुम ज़माने की बदलती हवाओं से
कि दौर ए ज़वाल में तुम कोई मेहमान लगते हो।

बदल जाएगी ये दुनिया भी तुम्हें एक दिन देखने के बाद,
तुम इस टूटते जहां में जीने का अरमान लगते हो।
- मोहम्मद आसिफ इक़बाल
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 घंटे पहले

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