इस बद मिजाज़ शहर को jeene ka सलीक़ा नहीं आता
मुस्कुरा दे कोई एक चेहरा ज़िंदगी को ऐसा लतीफ़ा नहीं आता
भले तुम भी आज़मा लो अगर तुम्हें यकीन नहीं आता
शाम तक रौन्द देंगे गले मिलने की आदत तुम्हारी
बहुत ख़फ़ा सा है ये शहर , अपनापन इन्हें रास नहीं आता
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