ये न समझो कि मोहब्बत ही नहीं थी पहले,
ये दिल-ओ-जाँ की इबादत ही नहीं थी पहले।
ये नई बात नहीं है, ये सबको लगता है,
कि उसकी अपनी कहानी ही सबसे उम्दा है।
भरी पड़ी है तवारीख़ आशिक़ों से मियाँ,
मोहब्बतों, इबादतों, रिफ़ाक़तों से मियाँ।
सुनो ये दास्ताँ गुज़रे हुए ज़माने की,
काम में लाओ अगर हो ये काम आने की।
कोई पसंद जो आए तो जाँ लुटा देते थे,
ज़मीं लुटा देते थे और आसमाँ लुटा देते थे।
उसे खरोंच भी आए तो दम निकलता था,
रात भी कटती न थी, दिन भी नहीं ढलता था।
उसे खुश देख लें तो सबसे हँस के मिलते थे,
झमक के चलते थे और फूल जैसे खिलते थे।
कहीं धोखे से जो साया भी उसका छू जाए,
तो दिन महीनों तलक ज़हन से खुशबू आए।
मना करे तो मनाते थे सौ वसीलों से,
बस इक झलक को झाँकते थे उन फ़सीलों से।
किया करते थे सौ जतन उसे हँसी आए,
इसी बहाने ज़हन-ओ-दिल में ताज़गी आए।
ये सब तो होता था, फ़रेब नहीं होते थे,
दीवाने होते थे, आसेब नहीं होते थे।
नए ज़माने ने फिर एक नया ज़ोर लिया,
इश्क़ ने हाथ में फिर H2SO4 लिया।
जिसे चाहा वही चेहरा बिगाड़ने के लिए,
कि अपना रौब मोहब्बत पे झाड़ने के लिए।
जिसे ख़्वाबों में तुमने रात-रात भर देखा,
ख़्वाब में देखा जिसे सुबह जाग कर देखा,
उसी चेहरे को जलाने चले हो... ज़िंदाबाद!
तुम अपना इश्क़ निभाने चले हो... ज़िंदाबाद!
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