काम काज करती स्त्रियाँ,
बालों को कानों के पीछे छिपाती,
सुंदर, सुशील, संस्कारी,
स्वयं से लड़ती स्त्रियाँ।
सुबह से रात तक घूमती घड़ी की
सुई सी स्त्रियाँ,
घर की देहलीज़ भी और दुनिया की
भीड़ भी।
एक हाथ में टिफ़िन, दूसरे में सपने,
और तीसरा हाथ... जो दिखता ही नहीं, वो सँवारती, संभालती स्त्रियाँ,
कि स्वयं से लड़ती स्त्रियाँ।
मुस्कान ओढ़े,
आँखों में थकान लिए,
हर बार "मैं ठीक हूँ",
की दास्तान देती स्त्रियाँ।
सबकी खुशियों का बोझ उठाती,
अपनी ख्वाहिशें छिपातीं।
हर सुबह मुस्कुरा कर,
नई शुरुआत करती स्त्रियाँ,
कि स्वयं से लड़ती स्त्रियाँ।
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