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बचपन का अंतर्विरोध

                
                                                         
                            चौराहे की लाल बत्ती पर एक बच्ची फुलौने बेच रही थी,
                                                                 
                            
मेरी बच्ची उन फुलौनों को, लेलेंने की जिद्द कर रही थी,
उमर उस बच्ची और मेरी बच्ची की, एक सी रही होगी,
एक बचपना खपा रही थी, और एक जिंदगी जी रही थी,
मैं अपनी प्यारी बच्ची के लिए फुलौने खरीद रहा था।

मैंने मोल कर मांगे सिक्के, उसकी हथेली पर रख दिए,
उसने मुस्कुरा के रंगीले फुलौने, मेरी बेटी को सौंप दिए,
मेरी बेटी की आँखों में एक, अनूठी खुशी का समंदर था,
फुलौने वाली बच्ची के आँखों में एक ठहरा सा मंज़र था।

एक फुलौने को पाकर ख़ुशी से, झूमझूम इतरा रही थी,
एक खिलौने बेचकर अपने घर का चूल्हा जला रही थी,
सड़क की तपिश में वो नंगे पैर, बहुत दूर तक चली थी,
एक का था आशियाना, और एक फुटपाथ पर पली थी।

बत्ती हरी होते गुम, ख्यालो में मेरी गाड़ी आगे बढ़ गई,
किन्तु वो मासूम सी सूरत, मेरे ज़हन में कहीं मढ़ गई।
सोचता रहा रस्ते भर, विधाता का कैसा यह विधान है,
उम्र एक सी ही दोनों की, किंतु कितनी अलग उड़ान है!
एक बचपन खपा रही थी, और एक जिंदगी जी रही थी,
मैं अपनी प्यारी बच्ची के लिए फुलौने खरीद रहा था।
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3 महीने पहले

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