दिल से निकली, पलकों पर ठहरी, नमी बनकर,
उनकी यादें आती है जिंदगी में इक कमी बनकर।
एक कंपकंपी रुककर चलती, चलकर रुकती है,
सांसें गहरी और गहरी ठहरी है शबनमी बनकर।
शिकायत उनसे भी है और खुदा से भी कि, वो
दिल से क्यूँ नहीं निकल जाते, इक पंछी बनकर।
फिर फूल बनकर मुस्कराना, अब सजा लगती है,
वो दिन गंवारा था,जब बिखरे थे पंखुरी बनकर।
होंठ हमारे जैसे अब कर्ज लेकर ही मुस्कराते हैं,
जिंदगी,जिंदगी ही न रहा अब जिंदगी बनकर।
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