आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सब्र का शोर

                
                                                         
                            हाथी, घोड़े, तोप, तलवार, फ़ौज तो तेरी सारी है,
                                                                 
                            
पर चुप रहने की शक्ति मेरी, अब सब पर भारी है।
शोर मचाकर टूट जाएगी इक दिन यह मग़रूर सियासत,
मेरा ये ख़ामोश सब्र ही तेरी महफ़िल उठने की तैयारी है।
बहुत कर ली सियासत तुमने झूठे इल्ज़ाम लगाने की,
अब ठान ली है हमने भी तुम्हें आईना दिखाने की।
ये बेबुनियाद शोर तुम्हारा महज़ एक साज़िश है,
बंद करो ये तमाशा अब देश को भड़काने की।
चुप रहकर भी हमने हर एक सच को सँभाला है,
तुम्हारी हर एक साज़िश का मुखौटा उतरने वाला है।
थाम लो अपने इस विरोध के बेक़ाबू तूफ़ान को,
क्योंकि जनता ने अब विकास और स्थिरता को सँभाला है।
मनगढ़ंत आरोपों से तुम सच को बदल नहीं पाओगे,
जनता के इस अटूट भरोसे को तुम हिला नहीं पाओगे।
रोक दो यह फ़िज़ूल का विरोध और नकारात्मकता,
काम बोलता है हमारा, तुम शोर से हमें झुका नहीं पाओगे।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर