जगमग जोत जले!
हरि के द्वार तले!
तरूण निशा चंचल उषा
हरि का निशदिन नमन करे!
तुंग शिखा उत्कंठ हवा
हरिकृपा का यतन करे!
करे अभिनंदन शंख ध्वनि
हे करूणाकर!मुकुटमनि!
धूल धनि जो पायी आसन
हरि के पांव तले.....
जगमग जोत जले....
कनक प्रभा सुधा शीतला के
अधीर नयन हरि दर्शन को
हिम-गिरि-सा निर्झर धवला
तकते हैं हरि नैनन को
करे अभिनंदन चंद्रप्रभा
शील समुंदर! श्याम घटा!
अखिल छटा होके नतमस्तक
हरि के आगे चले....
जगमग जोत जले....
हे जगत्राता! विश्व विधाता!
हरि का स्वर हरि अर्पण है
हे स्वर दाता!हे सुखदाता!
भले बुरे का दर्पण है
करे अभिनंदन कालजयी
अगम अगोचर! गूढ़मयी!
जब लहरायी ध्वंश पताका
हरि के बान चले....
जगमग जोत जले....
स्याही समंदर कानन लेखन
सूक्ष्म पड़े हरि महिमा को
नौ रस स्वर द्वय शब्द अलंकृत
उमड़ पड़े हरि महिमा को
करे अभिनंदन सर्व विधा
सृष्टि समग्र! हे परमपिता!
नाम तुम्हारा मुख से निकले
जब,जी तन से निकले....
जगमग जोत जले....
हरि के द्वार तले
जगमग जोत जले।।
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