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हर रेशे में

                
                                                         
                            एक धागा, दो धागे,
                                                                 
                            
तीन, चार, और अधिक धागे
धागों के हर रेशे में, समाहित हैं,
एक साधना, एक तपस्या
एक समर्पण, एक पूजा
और एक संकल्प

साधना- स्नेह सागर की
अनुपम विशालता को
यथावत् बनाए रखने की

तपस्या- हृदय में विराजित
पवित्र बंधन की अनमोल
शाश्वत पुनीत भावना के
पुनर्सृजन की

समर्पण- अद्भुत अकल्पनीय
स्नेह सुधा के अमरत्व को
त्रैकालिक बनाए रखने की

पूजा- ईश्वर के सृजन की
की इस जीवन दायिनी
सुरभि को सदा अक्षुण्ण
बनाए रखने की

संकल्प- भाई -बहन की
रगों में बहती निश्छलता,
कोमलता, स्नेह सीमा की
पराकाष्ठा, सुखद लौकिक
अनुभूतियों की मौन गर्जन को
धरती ,गगन, दिशा-दिशा में
विस्तारित करने की

राखी एक त्योहार ही नहीं है,
एक बहुमूल्य धरोहर है
हमारी संस्कृति की।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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