जब तक बाबूजी जिंदा हैं
फिकर नहीं किसी बात की।
सूरज को अपनी मुट्ठी में
चांद को लेकर जेब में
आसमान से तारे तोड़के
लाये खेल खेल में
दिन में मन का तेज है,चैन है सारी रात की
जब तक बाबूजी जिंदा हैं,
फिकर नहीं किसी बात की
धरती अंबर सागर सब
दौलत हैं संसार में
ज्यादा पूंजी बाबूजी के
बांहों के दुलार में
बाबूजी के हाथों में हैं, बौछारें सौगात की
जब तक बाबूजी जिंदा हैं
फिकर नहीं किसी बात की।
आंखों में अनुशासन है
उंगली में निर्देशन है
चेहरे की रेखाओं में
लिखा हमारा जीवन है
उनकी पहरेदारी में, गमों की क्या औकात ही,
जब तक बाबूजी जिंदा हैं
फिकर नहीं किसी बात की।
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