आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैदानों मे सरपट दौड़े धूम मचाती छुक-छुक गाती बाल रेल हैं।

                
                                                         
                            आओ बच्चों मिलकर खेलें खेल,
                                                                 
                            
मैं डिब्बा और तुम सब मिलकर बन जाओ रेल।
रेलगाड़ी, मालगाड़ी छोड़ मैं बैठूंगी बाल रेल मे,
जो रोकेंगा इसको ये पहुंचा देंगी उसको फौरन रेल मे।
बिना तेल, पेट्रोल के चलती अपनी ये गाड़ी हैं,
सड़क, पटरी पर नहीं!
मैदानों मे सरपट दौड़े धूम मचाती छुक-छुक गाती बाल रेल हैं।
बच्चे हीं बच्चे बस इसकी सवारी हैं,
अपनी ये गाड़ी सब गाड़ियों पर भारी है।
मैं हार्न बजाऊं..!
तुम-सब सीटी बजाओ,
स्टेशन-स्टेशन सबको पहुंचाओ।
बिना किराये के चलती अपनी ऐसी गाड़ी हैं,
एक-दूसरे को बांधने को हमने अम्मा की साड़ी फाड़ी हैं।
सब गाड़ियों मे अपनी गाड़ी भारी हैं,
क्यों कि..
बच्चे हीं बच्चे इसकी प्रिय सवारी हैं।
-मंजू मंजुला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर