टूटे थे तो बिखर गए
रूठे थे तो बिफर गए
कुछ रिश्ते थे पत्तों जैसे
छूटे तो फिर छूट गए
प्रकृति की रीत बनी थी
पत्तों की नियति यही थी
रिश्ते कोई पत्ते नहीं थे
खुद मानने को बने नहीं थे।
-मं शर्मा
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