मैं बूढ़ा हूँ।
अक्सर सोचता हूँ—
मैं ज़रूरी हूँ
या फिर मजबूरी हूँ।
कभी मेरा परिवार मेरी राह तकता था।
पत्नी, घर देर से आने पर,
प्यार भरी डाँट लगाती थी,
कुछ ज़्यादा ही फ़िक्र जतलाती थी।
मेरे बच्चे भी अपनी-अपनी फ़रमाइशें लिए
मेरे आस-पास मंडराते रहते थे।
मेरी आहट से ही,
उन्हें मेरे आने का पता चल जाता था।
फिर वक्त बीत गया...
और मैं बूढ़ा हो गया।
बेटे कमाने लगे,
और मैं—
बेकार,
मुफ़्त की रोटी तोड़ने वाला,
बेवजह की बातें करने वाला,
न जाने क्या-क्या कहलाने लगा।
जिसके बिना....
घर का पत्ता भी नहीं हिलता था,
आज उसका कोई वजूद नहीं रहा।
सबकी ज़रूरतें पूरी हो गईं,
और मैं...
किसी की ज़रूरत न रहा।
अक्सर सोचता हूँ—
मैं बूढ़ा हूँ।
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