एकहु दिन ना, बीते रे,
जब याद न आवे, गाँव,
खेतन के उ पगडंडी,
बगियन के उ, छाँव।
जिन गलियन मे, खेलत, कुदत्,
बचपन, गवा गुजर,
उन गलियाँ की याद मे,
लोचन, होय जात है, तर!
उदर, बुभुक्षित, थे, अभागे,
जो छुटा रे, गाँव और घर,
जिंदा तो है हम, लेकिन,
जीवन गया, है मर।
टीस शूल सा, चुभता है,
बरसों पुराना, घाव,
हृदय मे सुलगे, अग्नि समान,
धधके, बिछोह अलाव!
जीवन रुकत नाही बंधु रे,
गति ही, इसका स्वभाव,
समय गति, के पथ मे नही,
होता कोई, पडाव।।।
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