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वास्तविकता

                
                                                         
                            सोचती हूं मैं अक्सर क्या जिंदगी यही है,
                                                                 
                            
सब कुछ तो है पास मेरे पर मेरा कुछ भी नहीं है|
जिस आंगन में बचपन बिताया,
वह घर भी अपना नहीं है |

कहने को तो सारे रिश्ते अपने हैं,
पर इस दुनिया में अपना कोई नहीं है|
लोग क्या कहेंगे इस बात पर हम क्यों उलझते हैं,
जिंदगी तो एक ही है तो क्यों ना अपनी सुने|

माना की मंजिल दूर है ,
पर कम बढ़ाओ तो सही |
मुश्किल होगा सफर ,
पर खुद पर भरोसा तो करो |

राह में साथ ना भी मिला तो क्या हुआ,
जिंदगी के कुछ मीठे लम्हे ही बनाओ |
सफर में धूप तो बहुत होगी ,
पर तुम आज मेहनत करो तो सही |
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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