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खुद से मुलाकात

                
                                                         
                            कभी गिरकर संभलती हूँ,
                                                                 
                            
तो कभी अपनों से ही लड़ती हूँ ||
कभी हँसते-हँसते रो पड़ती हूँ,
तो कभी रोते-रोते हँस पड़ती हूँ ||
ये ज़िंदगी हर दिन कुछ नया सिखाती है,
और मैं हर दिन कुछ नया सीखती जाती हूँ ||
तूफानों से डरना छोड़ दिया है,
क्योंकि अब तो मैं हवाओं से भी लड़ पड़ती हूँ ||
कुछ सपने टूट गए,
कुछ अपने भी छूट गए ||
पर जो छूटा, उसने मुझे
एक नया सबक जरूर दिया ||
हर दर्द को ताकत बनाकर,
मेरी मुस्कान आगे बढ़ती गई ||
हर ठोकर ने राह दिखाई,
और मेरी हिम्मत और बढ़ती गई ||
हर दर्द को मुस्कान बनाया है,
हर ठोकर से कुछ पाया है ||
अब दुनिया चाहे कुछ भी कहे,
मैंने तो खुद को खुद से मिलाया है ||
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

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