रोज़ अहसान गिनाया मत कर
ऐसे मेयार गिराया मत कर
गर हवाओं से निभाना है रब्त
तो चराग़ों को जलाया मत कर
कर्ज़ रो रो के चुकाना पड़ जाए
ज़िन्दगी इतना हँसाया मत कर
तुझसे छोड़ी नहीं जाती है नींद
ख़्वाब आँखों में सजाया मत कर
साथ देती नहीं दुनिया 'कुलदीप'
झूठी उम्मीद लगाया मत कर
-कुलदीप
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X