चाहता हूँ:
चुप रहना चाहता हूँ
जैसे राह चुप है,
वृक्ष मौन हैं
नदियां कुछ नहीं बोलती हैं।
पहाड़ की तरह
शब्दहीन रहना चाहता हूँ,
जीवन की भाँति
उठना चाहता हूँ।
चाहता हूँ
चिट्ठी की तरह
बना रहूँ
और किताबों में पड़ा रहूँ।
मेरे मौन में
तप रहे,
हिमालय सी ऊर्जा
जीवन को चूमती रहे।
काँटों के बीच
खिलता रहूँ,
और आस्था के हाथों
चढ़ा दिया जाऊँ।
- महेश रौतेला
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