चलो साहित्य से तुम्हें मिलवाता हूँ।
साथ गुज़ारे हुए वक़्त की दास्ताँ सुनाता हूँ।।
कलम का रिश्ता दवात से है और दवात का काग़ज़ से।
जैसे हर रचना का रिश्ता अपने स्रष्टा से।।
भाव बड़े ही गहरे होते हैं जब लेखक दिल से लिखता है।
फिर उनकी रचनाएँ बार-बार पढ़ने का मन करता है।।
ऐसा क्या बदल गया कि इंसान न जाने कितनी रचनाओं से ऊब गया?
क्या पैरों में ज़ंजीरें बंधी हैं जो किसी पुस्तकालय की किताब तक नहीं पहुँच सकते?
ठेस पहुंचाने से किसी का भला नहीं होता है।
अगर कविता दिल से पढ़ी जाए तो हर लेखक का मन खुश हो जाता है।।
सबका साहित्य से रिश्ता बना रहे, यही इस मंच का सार है।
आज मिलाया इस मंच ने आपसे आप सभी को महेश का नमस्कार है।।
मैं अब अपनी इन पंक्तियों को विराम देता हूँ।
जब भी किसी मंच पर मिलें, तो मेरा मान बढ़ाइएगा।।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X