धनपत नाम, लमही धरा, प्रेमचंद कहलाए।
हिंदी-उर्दू दो आब बन,साहित्य जगत् में छाए।
गरीबों का दर्द लेकर, गीत कलम से गाए।
कलम को तलवार बनाकर देश को राह दिखलाए।
'कलम के सिपाही' संज्ञा ले, सम्राट बना उपन्यास।
कफ़न,गोदान,गबन,ईदगाह में दीन का प्रकाश।
तलब उठती पेट में, बना घीसू लत का दास।
कफ़न के पैसों से घीसू खा गया दारू -मांस।
अम्मा के हाथ न जले, हामिद 'ईदगाह' आया।
ले कर चार आने का चीमटा, त्योहार मनाया।
'पंच परमेश्वर' अलगू चौधरी, दोस्ती ठुकराया।
जुम्मन शेख-बुढ़ी खाला की,वो जीत बतलाया।
'निर्मला'दहेज की भेंट चढ़ी,'सेवा सदन' में नारी।
'बड़े घर की बेटी' ने सास की अकड़ उतारी।
'बुढ़ी काकी' झूठी पत्तलों से,भूख अपनी उतारी।
'दीनों का प्रेम' प्रेमचंद की कलम बनी अवतारी।
'गोदान' के हल दर को, कर्ज की मार सता रही थी।
किसान की कंबल,लगान में,'पूस की रात' बता रही थी।
'ठाकुर का कुआं' देख दलित को प्यास सता रही थी।
प्रेमचंद की कलम, छुआछूत की मार बता रही थी।
अड़ा रहा नमक - दरोगा, रिश्वत को ठुकराने में।
हट गया नौकरी से, भ्रष्ट अदालत के फरमाने में।
कुचल दिया धर्म ने धन को प्रेमचंद उस जमाने में।
शेष बहुत कुछ रह गया, यहां 'महेश' के बताने में।
-महेश तंवर
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