भर गए ताल- तलैया,जगह नहीं कोई खाली।
गिर गए दरखत सारे, रही नहीं कोई डाली।
जल-मग्न हो गए जन-जीव या पलायन हो गए।
कुपित हो गए इंद् या नारायण हो गए।
टुटा रह गया द्वार शेष दिख रही सूरज की आभा।
सुबह -शाम सम भाव,चाहे काशी या काबा।
नदी- नाले के तट पर बनाया घर जो अपना।
है चंद दिनों का सुख,एक दिन टूटता है सपना।
उनको मिलता था सुकून,वो झोंपड़ी ही महल थी।
सब हो गया सुनसान,कभी चहल-पहल थी।
माना मूर्ख हैं वो जन रोकते पानी का राह।
उन्हें नहीं कोई अधिकार,चाहे हो दुनिया का शाह।
सद्बुद्धि,संबल देना प्रभु, जहां में हैं वो जन।
तू दयालु,दीन कृपालु फिर खुशी से नाचे वो मन।
मुझे तेरी रज़ा में रहना है, कहता रहा महेश।
साधू -संत व मुर्शीद का है यही संदेश।
-महेश तंवर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X