आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बिखरे अक्स में खुद को बिखरते देखती हूँ

                
                                                         
                            बिखरे अक्स में खुद को बिखरते देखती हूँ,
                                                                 
                            
बिखरे अक्स को समेटे कोई तो चुभती हूँ।

अक्सर काँप उठती हूँ इस ख्याल से दोस्त,
तेरी जिंदगी से जब खुद को जो मिटाती हूँ।

मेरे ख्वाब तो तूफानों में उजड़ यूँ गये,
ख्वाब किसी के न टूटे बस यही चाहती हूँ।

वो शख़्स तो अब इस राह से गुरजता नहीं,
ना हीं मैं दरवाजे को उम्मीद से देखती हूँ।

अब ना होती है कोई आहट या दस्तक,
दिल की सुनसान जगह महसूस करती हूँ।
- माधवी आशरा
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
13 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर