लड़कियों ने बदल लिए हैं रास्ते,
जो बनाए गए थे उनके वास्ते।
अब द्रौपदी किसी क्रीड़ा का हिस्सा नहीं,
वह अपने आत्मबल की स्वयं प्रहरी है।
सीता को अब स्वर्ण-मृग नहीं लुभाता,
उसने आत्मसम्मान की रेखा स्वयं खींच ली है।
वह राष्ट्र के स्वप्नों की उजली ज्योति है,
सीमा पर अडिग खड़ी प्रथम पंक्ति की शक्ति है।
वह पालनहार है, ममता का अथाह सागर भी,
समय पुकारे तो वज्र-सी प्रचंड हुंकार भी।
अब वह केवल अपना नहीं,
समूचे युग का दायित्व संभालती है;
अपने भीतर जगा ली है
झाँसी की रानी सी ज्वाला।
अब वह किसी कथा की पात्र नहीं,
स्वयं महाकाव्य का उद्घोष है।
वह इतिहास के पन्नों में नहीं
स्वयं इतिहास की नई प्रस्तावना है।
वह भविष्य की रचयिता है,
वह परिवर्तन का विश्वास है;
अब किसी युग की प्रतीक्षा नहीं,
स्वयं नए युग का आरंभ है।
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