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बावूजी! तुम कहां चले गए

                
                                                         
                            बावूजी! तुम कहां चले गए
                                                                 
                            
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

आपका सरिता विहार से चंडीगढ़,
चंडीगढ़ से फरीदाबाद आना
जाना तो समझ आता है।
लेकिन अब क्यों नहीं कोई,
हमें आपका पता बताता है।
आपको क्या बताएं आपके बगैर
कुछ न भाता न सुहाता है।
आपके बगैर वो गली वो शहर,
सब सूना–सूना नजर आता है।
आपके साथ जैसे जीवन के,
गीत गजल रंग सब चले गए।

बावूजी! तुम कहां चले गए
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

आपके लिए वो सब्जीवाला
खूब आवाज लगाता होगा,
अब उसकी पूरी सब्जी खरीद,
गरीबों में कौन बांटता होगा?
आपके बगैर वो गली की गाय,
दरवाजे पर खड़ी रम्भाती होगी।
लेकिन आपके नहीं आने पर,
चुप उदास लौट जाती होगी।
घर दरवाजे वो संतो की टोली,
आकर अलख जगाती होगी
भोजन बिन पानी अन्नजल के,
दक्षिणा कहां से पाती होगी?
पता है महंगाई बढ़ गई है अब,
परिवार चलाना मुश्किल होगा,
लेकिन गरीबों के घर कौन अब,
चावल,आटा–दाल पहुंचाता होगा?
हे अनाथों के नाथ ! तुम्हें सब
लोग देखने को तरस गए।

बावूजी! तुम कहां चले गए
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

प्रेम, शांति और मानवता का,
तुमने सबको पाठ पढ़ाया था।
निर्बल और कमजोर की खातिर,
तुमने लड़ना हमें सिखाया था।
ईमानदारी से नहीं बड़ा कुछ,
सबको यह संदेश सुनाया था ।
खूब कमाओ मेहनत करके,
सोच समझकर खर्चा करना।
जीव–जंतु और दीनजनों की,
हर संभव तुम सेवा करना।
मानवता की जीवंत मूर्ति रहे,
उम्रभर सीखने की सीख देकर।

बावूजी! तुम कहां चले गए।
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

जीवन की इस भागदौड़ में,
समय किसी के पास नहीं।
खड़ा साथ में नहीं कोई,
रिश्तों का अहसास नहीं।
बुढ़ापे की लाठी बनकर
अपना आया पास नहीं ।
मेरा–तेरा करते हैं सब,
साथ नहीं कुछ जाएगा।
मुठ्ठी बांध के आया जग में,
खाली हाथ पसारे जाएगा।
यदि जाएगा कुछ साथ तो,
बस सद्कर्म तुम्हारा जायेगा।
अंत समय में सीख बड़ी ये,
देकर हमको किधर गए ?

बावूजी! तुम कहां चले गए...
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

आपके बताए रास्ते पर,
बावूजी हमको चलना है।
जीवन के इस कर्मयोग में,
पूरी लगन से मेहनत करना है।
जीवन की हर बाधाओं को,
हंसते गाते हुए पार करना है।
सत्य न्याय की खातिर हमको,
नहीं किसी से भी डरना है।
रहे आस–पास में सुखी सभी,
यह हमें सुनिश्चित करना है ।
कर्मवीर बनकर हमको भी,
सब दायित्व निर्वहन करना है।
पूरी कर जिम्मेदारी अपनी
क्यों हमें अकेला छोड़ गए?

बावूजी! तुम कहां चले गए...
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?

है यही निवेदन करना तुमसे
वापिस एक बार आ जाना ।
यूँ ही पास बैठ हमारे तुम,
चाय पीना और भजन गाना।
फिर सिर हाथ हमारे रख तुम,
अपना आशीर्वाद दे जाना।
करें तुम्हारे सब पूरे सपने,
वो हिम्मत हमको दे जाना।
रहोगे पास हमारे सदा तुम
अहसास ये हमें करा देना।
जिसको जो चाहिए वो लेले,
मेरे हिस्से बस तुम आ जाना।
हम कब से रहे पुकार तुम्हें
क्यों तुम हमको भूल गए?

बावूजी, तुम कहां चले गए...
तुम्हारा वियोग हम कैसे सहे?
-लोहित बैंसला
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4 दिन पहले

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