अज्ञान-तमस के मध्य जो,
प्रज्ञा का दीप प्रज्वलित करते हैं।
मोह-मरीचिका से मुक्त कर,
सत्य-पथ का संधान करते हैं।
गुरु हैं ज्ञान-सुधा के सागर,
गुरु हैं चेतना के अधिष्ठाता।
संशय, शंका, भ्रम हरकर,
बनते हैं जीवन के पथ-प्रदाता।
उनकी वाणी मंत्र-सम,
उनका अनुशासन साधना।
उनके चरणों में नत होकर,
सीखें जीवन की आराधना।
संस्कारों का बीज रोपकर,
चरित्र-पुष्प को विकसित करते।
विवेक-ज्योति प्रज्वलित करके,
मानव को मानवत्व समर्पित करते।
गुरु केवल ज्ञान नहीं देते,
अंतरात्मा का बोध कराते हैं।
पतनशील पथ से रोक हमें,
उत्कर्ष-शिखर तक ले जाते हैं।
हे गुरुवर! आपका सान्निध्य,
जीवन का परम सौभाग्य है।
आपकी कृपा से ही संभव,
ज्ञान, विवेक और सद्भाव है।
गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णुः—
यह उद्घोष नहीं केवल वाणी,
गुरु ही जीवन की वह ज्योति,
जिससे प्रकाशित हो मानव-कहानी।
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