आखिर कब तक हम अपनी भाषा को
सुधारते रहे।
कब तक अपने कपड़ो को
संभालते रहे।
कब तक तमाम पाबंदियों को
झेलते रहे।
कब तक ये करे,ये न करे - को
सुनते रहे।
आखिर कब तक हम अबला के
रूप को लेकर चले।
कब तक घुटते रहे,बंद रहे और कुछ
न कहे।
आखिर कब तक हम यूं ही
चुप रहे।
आखिर कब तक हम यूं ही चुप रहे।
और कितना सहे??
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