त्रिनेत्र को खोलो अब,
देवाधिदेव हे महादेव,
पालक तू संहारक तू ,
प्रतिमस्तक से नतमस्तक हम।
मन के विकार का साक्षी से
छिड़ा हुआ है महायुद्ध ,
कोई मदद नहीं मिलती मांगे,
असहाय हूं मन का गुलाम हूं,
कुछ भला करो हे महादेव,
भक्तों के नाथ तुम हो दयालु ,
अब कृपा करो-अब कृपा करो।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X