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गुमनाम जिंदगी

                
                                                         
                            इस भीड़-भाड़ में,
                                                                 
                            
गुम रहना चाहता हूं,
नामवर बनने में,
आलोचनाएं सुनने को,
लगातार मिलती रहती हैं,
यहां तक कि लोग,
झूठी बुराइयां भी कहते रहते हैं।
अपडेट होती जिन्दगी में,
दिनों-दिन थकावट,
महसूस हो रही है,
जिन्दगी ने एहसास कराया है,
नामवाला बनने से,
तमाम तरह की परेशानियां,
अपने आप आ जाती है।
इसीलिए हम सोंचते हैं,
हमें गुमनाम ही रहने दो,
जहां दूर-दूर तक कोई,
जानने वाला ना हो।
जानने वाला ना हो।।
-कुलदीप शुक्ला
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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