मेरे देश के नौजवानों,
देश तुमसे मांगता है।
सद्विचारण ग्राह्यता व,
दुर्विचारण की वीरानी।।१।।
यह देश मेरा है युवा,
तप त्याग का ले कर दुवा।
प्रखरता की धार मांगें,
आत्म मंथन की रवानी।।२।।
यह उबलता ज्वार कैसा,
है दे रहा संताप कैसा।
नैराश्य के अभिशाप में ही,
संभाव्य की रचती कहानी।।३।।
उद्गार में भावना की तरलता,
ना हो कहीं पर दृष्टित मलिन सा।
उद्वेग के संवेग को थाम लो तुम,
धीरता के पुट दे नूरानी ।।४।।
फूल के संग गर कहीं पर शूल हों,
चून लो उन्हें तुम पलकों से पल में।
निर्मूल कर मग कंटकों से,
सबको दिखा अपनी जवानी।।५।।
आक्रोश को कौशल बना लें,
आपदा को अवसर में ढालें।
नवाचार आलोक में नवशोध कर,
परखो कभी अपनी पेशानी।।६।।
हैं हमारे बीच के ही वे शिकारी,
जो करते रहते हैं शिकार,जान लो।
समाज के वे विकृत मुखौटे,
रट लगाते रहते बेमानी।।७।।
सज रहा है देश अभिनव रंग में,
विविधता का पुट लिए एकता के संग में।
अनेकता में एकता की लौ जलाओ,
छोड़ यह कुण्ठित कुटिलता व कुबानी।।८।।
आजादी की मर्यादा को अब,
आजादी से आजादी में ढलने दें।
अनुशासन में रहकर तो समझें,
प्रगति का चढ़ता सोपानी।।९।।
दिग्भ्रमित हो यूं भटकना छोड़ दें,
देश हित में विकासोन्मुख मोड़ लें।
पथ सभी दिखला रहे हर पन्थ के,
देश सबका है,सबनें है मानी।।१०।।
देश विकास के पथ पर है,
नहीं कोई इसमें संसय है।
उन्मत्त नहीं, उपयुक्त बनें,
देश हित खातिर वो जानी।।११।।
जश्न -ए-आजादी सभी को हो मुबारक,
मां भारती की गरिमा अक्षुण्य रहे मुबारक।
आन बान और शौर्य का केतन ,
तिरंगा का,व्योम में हो ऊंचा उड़ानी ।।१२।।
-कृष्ण मुरारी पाण्डेय
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