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तमाम खुशियाँ मेरी इक इबादत से शुरू हैं

                
                                                         
                            तमाम खुशियाँ मेरी इक इबादत से शुरू हैं
                                                                 
                            
सभी अफसाने खुशनुमा आंखों से शुरू हैं

बस लेहजे की ठंडक से प्यास बुझती दिल की
तपिश के साये चमकते सितारों से शुरू हैं

कल नापसंद थी आज वही बातें पसंद हैं
उसी नाम के हर हरफ़ खूशबूओं से शुरू हैं

जुगनू से गुज़ारिश शब-ए-शम्मा जलाने को
फ़क़त ये ख़्वाब पलकों की शरारत से शुरू हैं

कभी कही न जो बातें आंखें बयां करती हैं
सभी वो किस्से ज़िन्दगी की किताब से शुरू हैं

सादगी की पहचान ख़ामोशी से हो जाती
मगर आइने रज़ामंदी की पैरवी से शुरू हैं

हॅंसी की गूँज से दीवारें मजबूत होंगी
मिरी सांसों के तराने आरज़ूओं से शुरू हैं

वर्षों से ढूँढे थे लफ्ज अब शिरकत किए हैं
फसाने ताबूत में बंद शोहरत से शुरू हैं

ज़िन्दगी धूप से बच ज़मीं पर उतर आई हैं
मौसिकी की चाहत रबाब-ए-साज़ से शुरू हैं।
-किरण मिश्रा
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2 महीने पहले

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