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रिश्तों का मतलब

                
                                                         
                            लोगों को जरूरत पसंद है, इंसान नहीं,
                                                                 
                            
मतलब हो तो सब अपने, वरना कोई पहचान नहीं।

लोग तो भगवान को भी मतलब से याद करते हैं,
हम तो बस इंसान हैं साहब, किसी का भगवान नहीं।

इस रील्स के जमाने में फुर्सत किसे है साहब,
हर कोई मतलबी है—मगर सब एक समान नहीं।

उँगली घिसकर घंटों देख लेंगे वीडियो और शॉर्ट्स,
मगर अपनों के लिए दो पल निकालना आसान नहीं।
-के. सी. साधु ‘चाँद’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक महीने पहले

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