ख़्वाहिश है एक बार तुझे गले से लगा लूँ,
यादों में कब तक तेरी मोहब्बत सँभालूँ।
हर रात तेरी याद में आँखें हैं जागती,
बता अपने दिल को मैं आख़िर कैसे मना लूँ।
तेरे बिना ये ज़िंदगी वीरान-सी लगती है,
किस-किस बहाने दिल को अब मैं बहला लूँ।
तू पास नहीं, फिर भी हर धड़कन में बसी है,
कैसे मैं अपने दिल से तेरा नाम मिटा लूँ।
इक बार जो मिल जाए तू किस्मत की तरह,
बाँहों में भर के सारी शिकायतें भुला लूँ।
दुनिया की रस्मों से हम कभी मिल नहीं सकते,
आ जा कि आज सारी ये दीवारें गिरा लूँ।
'चाँद' की बस इतनी-सी दुआ है ऐ सनम,
उम्र भर न सही, कुछ पल तुझे अपना बना लूँ।
— के. सी. साधु "चाँद"
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