मैं ख़ामोश सायों और भूतों से गुफ़्तगू करती हूँ,
साँपों की सरसराहटों के संग बेफ़िक्र रहती हूँ।
नाज़ुक, फ़ानी फूलों से कभी दिल लगा ही नहीं,
मैं तो तीखे काँटों की नोक पर हँसते हुए खेलती हूँ।
हाँ, मैं रहती हूँ अपनी ही रची एक छोटी-सी कायनात में,
एक ठहरा हुआ, सुकूँ से भरा, प्यारा-सा तालाब है मेरा।
जहाँ ज़माने की मैल और दिखावे का कोई रंग नहीं चढ़ता,
जहाँ मेरे ही हाथों से रंगे हुए कमल हर रोज़ खिलते हैं।
मुझे रास नहीं आती यह शोर से भरी, खोखली नई दुनिया,
जहाँ चेहरे हज़ारों हैं, मगर रूहानियत रत्ती भर नहीं।
मैं तो लौट जाना चाहती हूँ उस बीते हुए पुराने वक़्त में,
जहाँ सादगी में ही पूरी ज़िंदगी सिमट जाया करती थी।
जब शब्दों की नुमाइश नहीं, लिखावट से इश्क़ हुआ करता था,
काग़ज़ की एक-एक सतर में छुपा जज़्बात मुस्कुराता था।
जब इस स्क्रीन और मोबाइल की बेज़ार बेचैनी का वजूद न था,
बस डाकिया की आहट और उस चिट्ठी का शिद्दत से इंतज़ार हुआ करता था।
जब गानों की हर धुन में शोर नहीं, बस इबादत हुआ करती थी,
संगीत के हर एक लफ़्ज़ में रब की इनायत हुआ करती थी।
जहाँ ज़मीर ज़िंदा था और नियत पाक हुआ करती थी,
कि हर एक रूह के भीतर परमात्मा की मूरत हुआ करती थी...
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