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तुम क्या जानते हो ?

                
                                                         
                            इस जहाँ में बड़े परवाने बने फिरते हो,
                                                                 
                            
कमफ़हम, हर हँसी को ख़ुशी मानते फिरते हो।

दावा भी है तुम्हें कि हक़ीक़त-ए-ज़िंदगी जानते हो,
फिर क्यों मरने वाले की मौत का मातम मनाते हो?

पर्दानशीं औरतों के बारे में खूब जानते हो,
फिर उनके ज़ख़्मों के बारे में क्या जानते हो ?

मरने-वरने की बातें बहुत करते हो,
क्या तुम ज़िंदगी जीना भी जानते हो?

तुम कहते हो ,सब कुछ जानते हो,
क्या तुम औरत के हिस्से का दर्द भी जानते हो?
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

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